Home छत्तीसगढ उत्तर बस्तर कांकेर : जिनसे कभी संघर्ष था, उन्हीं की कलाई पर...

उत्तर बस्तर कांकेर : जिनसे कभी संघर्ष था, उन्हीं की कलाई पर बांधी राखी

8
0
Jeevan Ayurveda

anjanikhabar:

उत्तर बस्तर कांकेर : जिनसे कभी संघर्ष था, उन्हीं की कलाई पर बांधी राखी

Ad

चौगेल पुनर्वास केंद्र में आत्मसमर्पित माओवादियों ने डी आर जी जवानों को बांधी राखी, कहा—अब बंदूक नहीं, हुनर से संवारेंगे भविष्य

उत्तर बस्तर कांकेर

कभी जंगलों में बंदूक के साथ आमने-सामने रहने वाले हाथ आज भाईचारे और विश्वास के धागे से जुड़ गए। भानुप्रतापपुर क्षेत्र के ग्राम चौगेल (मुल्ला) स्थित पुनर्वास केंद्र में आज आत्मसमर्पित माओवादियों ने जिला रिजर्व गार्ड डी आर जी के जवानों को राखी बांधकर रक्षाबंधन का पर्व मनाया। यह दृश्य संघर्ष से शांति, हिंसा से मुख्यधारा और हथियार से हुनर की ओर बढ़ते बदलाव की भावुक तस्वीर बन गया। आत्मसमर्पित माओवादी शांति कवाची ने बताया कि वह पहली बार रक्षाबंधन का त्योहार मना रही हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री कौशल विकास प्रशिक्षण के माध्यम से उन्होंने राखी बनाना सीखा और आज उन्हीं हाथों से तैयार की गई राखी पुलिस जवानों की कलाई पर बांधना उनके लिए बेहद खास और भावुक अनुभव है।

उन्होंने कहा कि आत्मसमर्पण के बाद अब ऐसा महसूस हो रहा है कि वे वास्तव में समाज की मुख्यधारा में लौट आई हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि नक्सल पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर उन्होंने आत्मसमर्पण का निर्णय लिया। पुनर्वास केंद्र में उन्हें सिलाई, काष्ठ शिल्प कला और राखी निर्माण सहित विभिन्न कौशलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे भविष्य में इन हुनरों के माध्यम से सम्मानपूर्वक आजीविका चला सकें और अपने परिवार के साथ समाज में सामान्य जीवन जी सकें। वहीं डी आर जी जवान टेकेश्वर हिचामी ने कहा कि पहले परिस्थितियां ऐसी थीं कि दोनों पक्ष बंदूक लेकर आमने-सामने रहते थे। आज वही हाथ राखी के पवित्र धागे से जुड़े हैं। उन्होंने कहा, आज उनकी बांधी राखी हमारी कलाई पर है, जो भाई की लंबी उम्र और सुख-शांति की कामना का प्रतीक है। यह अपने आप में एक अलग और भावुक अनुभव है। यह रक्षाबंधन सिर्फ एक पर्व का उत्सव नहीं, बल्कि बदलाव की उस कहानी का प्रतीक है, जिसमें कभी संघर्ष का हिस्सा रहे लोग आज विश्वास और भाईचारे के रिश्ते को स्वीकार कर रहे हैं। पुनर्वास और कौशल विकास के माध्यम से आत्मसमर्पित माओवादी अब अपने हाथों में हथियार की जगह हुनर लेकर नई जिंदगी की शुरुआत कर रहे हैं।कल तक आमने-सामने थे, आज एक-दूसरे की कलाई पर विश्वास का धागा है।

बंदूक से राखी तक का यह सफर, शांति और पुनर्वास की नई कहानी लिख रहा है।

Jeevan Ayurveda Clinic

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here