anjanikhabar:
AI की दुनिया में बड़े-बड़े डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं. इन केंद्रों पर चैटबॉट, इमेज जनरेशन, वीडियो प्रोसेसिंग और दूसरी AI सेवाओं को चलाने के लिए भारी कंप्यूटिंग क्षमता चाहिए. इसके लिए सामान्य मेमोरी के साथ हाई-बैंडविड्थ मेमोरी यानी HBM की भी बड़े पैमाने पर जरूरत पड़ती है.
मेमोरी बनाने वाली कंपनियों के सामने चुनौती यह है कि उन्हें सीमित उत्पादन क्षमता से AI कंपनियों की बढ़ती मांग भी पूरी करनी है और स्मार्टफोन, लैपटॉप जैसे दूसरे बाजारों को भी सप्लाई देनी है. Jefferies का अनुमान है कि कैलेंडर वर्ष 2027 में कुल मेमोरी मांग का करीब 60 फीसदी हिस्सा AI से आ सकता है. रिपोर्ट में इसी साल AI कंपनियों के कुल पूंजीगत खर्च का लक्ष्य करीब 1.5 ट्रिलियन डॉलर बताया गया है. यह अनुमान है, पक्का खर्च या पूरा हो चुका निवेश नहीं.
इसका असर मोबाइल कंपनियों की लागत पर पड़ रहा है. Jefferies के अनुसार, एक स्मार्टफोन में लगने वाली मेमोरी की अनुमानित लागत 2025 में करीब 20 डॉलर थी, जो अब बढ़कर 60 से 65 डॉलर तक पहुंच गई है. यानी प्रति फोन खर्च लगभग तीन गुना हो गया है. रिपोर्ट का अनुमान है कि मेमोरी की कीमतें 2027 के मध्य तक अपने ऊंचे स्तर पर पहुंच सकती हैं.
सस्ते Android फोन पर सबसे ज्यादा दबाव क्यों?
महंगे फोन बनाने वाली कंपनियों के पास कीमत और मुनाफे को संभालने के लिए कुछ गुंजाइश होती है. लेकिन 200 डॉलर से कम कीमत वाले Android स्मार्टफोन का कारोबार कम मार्जिन पर चलता है. यहां फोन की कुल निर्माण लागत यानी Bill of Materials में मेमोरी की हिस्सेदारी करीब 60 फीसदी तक बताई गई है.
ऐसे में मेमोरी महंगी होने पर कंपनियों के सामने तीन रास्ते बचते हैं. वे फोन की कीमत बढ़ाएं, अपने मुनाफे में कटौती करें या फिर फोन के हार्डवेयर और फीचर में बदलाव करें. Jefferies ने सस्ते फोन की कीमत में करीब 30 फीसदी तक बढ़ोतरी की आशंका जताई है. यह हर मॉडल पर लागू होने वाला तय मूल्य-वृद्धि आदेश नहीं, बल्कि लागत और बाजार की स्थिति पर आधारित विश्लेषण है.
इसका असर भारत जैसे बाजार में खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां बड़ी संख्या में ग्राहक सीमित बजट में नया फोन खरीदते हैं. हालांकि, Jefferies के ये आंकड़े वैश्विक बाजार के अनुमान हैं. इन्हें भारत में हर स्मार्टफोन की कीमत में 30 फीसदी बढ़ोतरी की घोषणा नहीं समझना चाहिए.
नया फोन खरीदें या पुराने से चलाएं?
अगर बजट स्मार्टफोन महंगे होते हैं, तो ग्राहक खरीदारी टाल सकते हैं. कुछ लोग पुराने फोन की बैटरी बदलवाकर या उसकी मरम्मत कराकर कुछ और समय तक इस्तेमाल करना पसंद कर सकते हैं. वहीं, कम कीमत में बेहतर स्पेसिफिकेशन पाने के लिए सेकेंड-हैंड या रिफर्बिश्ड फोन का बाजार भी बढ़ सकता है.
लेकिन इस्तेमाल किया हुआ फोन खरीदते समय केवल कीमत देखना पर्याप्त नहीं है. उसकी बैटरी की स्थिति, डिस्प्ले, कैमरा, नेटवर्क कनेक्टिविटी और चार्जिंग पोर्ट जांचना जरूरी है. यह भी देखना चाहिए कि फोन को अभी सिक्योरिटी अपडेट मिल रहे हैं या नहीं. बहुत पुराना फोन सस्ता जरूर मिल सकता है, लेकिन बैंकिंग और निजी डेटा के इस्तेमाल में सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकता है.
ग्राहकों के लिए एक दूसरा विकल्प मौजूदा फोन को थोड़ा लंबा चलाना है. अगर फोन सामान्य काम कर रहा है, तो सिर्फ नया मॉडल आने के कारण अपग्रेड करना जरूरी नहीं. लेकिन बैटरी, स्टोरेज या सॉफ्टवेयर सपोर्ट की समस्या हो, तो खरीदारी टालने का फैसला जरूरत के हिसाब से करना चाहिए.
दुनिया में सस्ते फोन की हिस्सेदारी घटने का अनुमान
Jefferies ने वैश्विक स्मार्टफोन बाजार के लिए भी कमजोर तस्वीर पेश की है. रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया भर में स्मार्टफोन शिपमेंट 2026 में सालाना आधार पर 15 फीसदी घटकर 1,067 मिलियन यूनिट और 2027 में 911 मिलियन यूनिट तक आ सकता है. शिपमेंट का मतलब कंपनियों की ओर से बाजार में भेजे गए फोन की संख्या है, यह ग्राहकों की वास्तविक खरीदारी का सीधा आंकड़ा नहीं है.
रिपोर्ट में 200 डॉलर से कम कीमत वाले स्मार्टफोन की वैश्विक बाजार हिस्सेदारी 2025 के 42 फीसदी से घटकर 2026 में 24 फीसदी होने का अनुमान है. इसके उलट, 600 डॉलर से महंगे स्मार्टफोन की हिस्सेदारी 29 फीसदी से बढ़कर 38 फीसदी हो सकती है.
इस बदलाव का अर्थ यह नहीं है कि महंगे फोन की बिक्री हर जगह तेजी से बढ़ेगी. बाजार में सस्ते फोन की उपलब्धता घटने या उनकी बिक्री कमजोर होने पर भी प्रीमियम श्रेणी की हिस्सेदारी अपने आप बढ़ सकती है. यानी कुल बाजार में महंगे फोन का अनुपात बढ़ना और उनकी वास्तविक बिक्री बढ़ना दो अलग बातें हैं.
कंपनियां पुराने प्रोसेसर का सहारा ले सकती हैं
मेमोरी के अलावा सेमीकंडक्टर सप्लाई की कमी भी मोबाइल कंपनियों के लिए चुनौती बन रही है. Jefferies की रिपोर्ट के अनुसार, लागत कम रखने के लिए निर्माता एक या दो साल पुराने चिपसेट का इस्तेमाल करने पर विचार कर सकते हैं. इससे फोन की कीमत नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है, लेकिन ग्राहकों को हर मॉडल में सबसे नया प्रोसेसर या अत्याधुनिक फीचर नहीं मिलेगा.
कंपनियां कम बिकने वाले सस्ते मॉडल की संख्या घटा सकती हैं और वितरण नेटवर्क को भी छोटा कर सकती हैं. इसका असर छोटे शहरों और कस्बों के खुदरा बाजार पर पड़ सकता है, जहां ग्राहक अक्सर सीमित बजट में कई विकल्पों की तुलना करके फोन खरीदते हैं.
रिपोर्ट ने यह चेतावनी भी दी है कि अगर 2028 से स्मार्टफोन की मांग तेजी से लौटती है, तब भी कंपनियों के लिए उत्पादन क्षमता को पहले के स्तर पर लाना आसान नहीं होगा. मौजूदा मंदी के दौरान अगर निर्माता फैक्टरी क्षमता और सप्लाई नेटवर्क घटाते हैं, तो मांग लौटने पर सप्लाई बढ़ाने में समय लग सकता है.









