Home ट्रेंडिंग सिजेरियन डिलीवरी का बढ़ता चलन,मेडिकल जरूरत या बड़ा बिज़नेस?

सिजेरियन डिलीवरी का बढ़ता चलन,मेडिकल जरूरत या बड़ा बिज़नेस?

13
0
Jeevan Ayurveda

आज के दौर में मातृत्व का अनुभव कुदरती प्रक्रिया से हटकर व्यापारिक मोड़ ले चुका है। चिकित्सा जगत में अब प्रसूता को एक सामान्य महिला के बजाय मरीज की तरह देखा जा रहा है। आंकड़ों की मानें तो भोपाल जैसे बड़े शहरों के निजी अस्पतालों में हर दूसरा बच्चा सर्जरी के जरिए दुनिया में आ रहा है, जबकि सरकारी अस्पतालों में भी यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। ‘हाई रिस्क प्रेगनेंसी’ का डर दिखाकर प्रसव जैसी स्वाभाविक प्रक्रिया को एक गंभीर बीमारी की तरह पेश किया जा रहा है, जिससे सामान्य डिलीवरी का चलन धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।

प्राइवेट अस्पतालों मे भर्ती होते ही शुरू होता खेल
निजी अस्पतालों में जैसे ही कोई गर्भवती महिला दाखिल होती है, वहां के माहौल में एक मनोवैज्ञानिक दबाव और डर का संचार शुरू कर दिया जाता है। वार्ड से लेकर लेबर रूम तक ऐसी परिस्थितियां बनाई जाती हैं कि घबराए हुए परिजन सुरक्षा के नाम पर सिजेरियन के लिए तुरंत तैयार हो जाते हैं। यही वजह है कि पिछले एक दशक में प्रदेश के भीतर सिजेरियन ऑपरेशन से होने वाले जन्मों की संख्या दोगुनी हो गई है, जो सीधे तौर पर व्यापारिक मानसिकता की ओर इशारा करती है।

Ad

WHO के चौकाने वाले आंकड़े
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा जारी चौंकाने वाले आंकड़े बताते हैं कि निजी अस्पतालों में सिजेरियन प्रसव का अनुपात 45 प्रतिशत के पार जा चुका है, जबकि सरकारी अस्पतालों में यह आंकड़ा 34 प्रतिशत के आसपास है। ये भिन्नताएं सवाल खड़ा करती हैं कि क्या अस्पताल बदलने मात्र से चिकित्सा की आवश्यकताएं भी बदल जाती हैं? यह विरोधाभास साफ करता है कि प्रसव का तरीका अब मां की सेहत से ज्यादा अस्पताल के मुनाफे और डॉक्टर की सुविधा पर निर्भर करने लगा है।

परिवार में ऐसे बनाते है डर
प्रसव के इस पूरे ‘बाजार’ को समझना हो तो उन परिवारों की कहानी देखनी होगी, जिनसे सामान्य स्थिति होने के बावजूद सिजेरियन की सहमति ली गई। अक्सर डॉक्टर तर्क देते हैं कि नॉर्मल डिलीवरी में बहुत समय लगेगा और ऑपरेशन करना ज्यादा सुरक्षित और त्वरित विकल्प है। बच्चे की सुरक्षा को लेकर माता-पिता की भावनाएं इतनी प्रबल होती हैं कि वे भारी-भरकम बिल के सामने सवाल पूछना भूल जाते हैं। एक सिजेरियन प्रसव का औसत खर्च 85 हजार से एक लाख रुपये तक पहुंच जाता है, जिससे यह पूरा क्षेत्र करोड़ों के कारोबार में तब्दील हो गया है।

सिजेरियन डिलीवरी में पैसों का खेल
भारत में सिजेरियन (C-Section) प्रसव की दर अब 27.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के 10-15 प्रतिशत के मानक से कहीं अधिक है। साल 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में हुए कुल प्रसवों में से लगभग 54 लाख बच्चे ऑपरेशन के जरिए हुए। यदि एक ऑपरेशन का खर्च एक लाख रुपये माना जाए, तो यह 54 हजार करोड़ रुपये से अधिक का एक संगठित ‘सी-सेक्शन बाजार’ बन चुका है। अकेले राजधानी भोपाल में ही इस माध्यम से करोड़ों का राजस्व पैदा हो रहा है।
महिलाएं प्रसव पीड़ा सहने को तैयार नहीं; डॉक्टर के अपने तर्क

दूसरी ओर, विशेषज्ञ और डॉक्टर अपनी दलील देते हुए कहते हैं कि आधुनिक जीवनशैली और देर से होने वाली शादियां इसकी बड़ी वजह हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अब महिलाएं प्रसव पीड़ा सहने को तैयार नहीं हैं और चिकित्सा संबंधी जोखिमों से बचने के लिए सिजेरियन का चुनाव किया जा रहा है। शहरी जीवन में बढ़ता तनाव, भय और शुभ मुहूर्त में बच्चे के जन्म की चाहत जैसे सामाजिक कारण भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं।
परिवारों और गर्भवती महिलाओं को सही परामर्श बेहद जरूरी- एक्स्पर्ट्स

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रसव के प्रति महिलाओं के मन में बैठे डर को दूर करने की आवश्यकता है। गर्भावस्था के दौरान सही सलाह, भावनात्मक सहयोग और धैर्य की कमी के कारण महिलाएं ऑपरेशन का रास्ता चुनती हैं। यदि परिवारों और गर्भवती महिलाओं को सही जानकारी और मानसिक मजबूती दी जाए, तो इस बढ़ते हुए ‘सर्जरी कल्चर’ पर अंकुश लगाया जा सकता है।

 

Jeevan Ayurveda Clinic

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here