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नए साल पर शी जिनपिंग के लिए चौतरफा संकट, कोविड के बीच नागरिकों ने खोला मोर्चा, लगाई पाबंदियां

चीन
चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने नए साल पर अपने पहले संबोधन में यह माना है कि देश कोविड-19 की कड़ी चुनौतियों का सामना कर रहा है। कोविड संकट के बीच देशभर के लोगों में अब जिनपिंग के खिलाफ आक्रोश उभरने लगा है। दरअसल, तीसरा कार्यकाल हासिल करने के बाद जिनपिंग ने सारी शक्तियां अपने हाथों में कर ली है ताकि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी उदार विचार और लोगों के दबाव में बह न जाए। इस तरह वह पहले के मुकाबले अधिक दबंग हो गए हैं।

सिंगापुर पोस्ट ने लिखा है कि भले ही शी जिनपिंग अपने हाथों में सत्ता केंद्रित कर पहले से अधिक दबंग या अधिनायकवादी हो गए हों लेकिन चीन में लोग अब उनपर सवाल उठाने लगे हैं क्योंकि हाल ही में शी को शून्य-कोविड नीति को लेकर पूरे चीन में लोगों का गुस्सा देखना पड़ा था। सिंगापुर पोस्ट के मुताबिक, शी जिनपिंग प्रशासन के कड़े निर्देश पर कोविड वायरस संक्रमण को नियंत्रण में रखने के लिए लोगों को महीनों तक घर के अंदर रहने को मजबूर रहना पड़ा। इससे लोगों में गुस्सा भर आया था। लोगों ने जब विरोध शुरू किया तो सरकार ने उके खिलाफ दमन की कार्रवाई न करते हुए चुपके से ज़ीरो-कोविड नीति को रद्द कर दिया, ताकि लोगों का गुस्सा कम किया जा सके।

शी जिनपिंग एकमात्र ऐसे नेता हैं जिनका चीनी सेना पर नियंत्रण है। यहां तक ​​कि शी ने पीएलए ज्वाइंट बैटल कमांड के कमांडर-इन-चीफ का नया पद भी खुद संभाल लिया है। अर्धसैनिक पुलिस भी शी के सीधे प्रभार में है। बता दें कि शी ने शासन में लंबे समय तक बने रहने के लिए अपने पहले कार्यकाल में भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के नाम पर हजारों नेताओं, आलोचकों, प्रतिद्वंदियों और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया था और सभी प्रकार के विरोधियों और असहमति रखने वालों को कुचल दिया था।

शोधकर्ता बताते हैं,"शी ने वामपंथी विचारधारा को किनारे कर दिया है और बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और निजी व्यवसायियों में डर पैदा कर रहे हैं।" शोधकर्ताओं के मुताबिक, 2013 के बाद से, CCP ने "आधिकारिक रूप से मीडिया और पश्चिमी मूल्यों से जुड़े सात विषयों की कक्षा में चर्चा पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिन्हें विध्वंसक माना जाता है। ये विषय हैं- सार्वभौमिकता, प्रेस की स्वतंत्रता, न्यायिक स्वतंत्रता, नागरिक समाज, नागरिकों के अधिकार, पार्टी की ऐतिहासिक गलतियाँ, और संभ्रांत वित्तीय और राजनीतिक हलकों के भीतर भाईचारा"। यूनिवर्सिटी प्रोफेसरों को भी पार्टी और सरकार के खिलाफ आलोचनाओं से निपटने की जिम्मेदारी दी गई है। इसके अलावा वेस्टर्न टेक्स्टबुक पर बैन लगा दिया गया है।
 

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