नासूर बन चुके जख्म का मेकाहारा के रेडियोलॉजी विभाग ने किया मरहम का काम

रायपुर
वेरिकोज वेन नामक बीमारी के कारण दस साल से सही इलाज के अभाव में पैर में लगभग 4 से 5 इंच तक घाव बनकर नासूर हो चुका था। कई स्थानों पर अलग-अलग पद्धति से इलाज कराया लेकिन नतीजा शून्य निकला। अंतत: आखिरी उम्मीद के तौर पर डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्मृति चिकित्सालय पहुंचा जहां पर रेडियोलॉजी विभाग के इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट डॉ. विवेक पात्रे को दिखाया। डॉ. पात्रे ने कलर डॉप्लर करने के बाद बीमारी को सटीक तौर पर पहचान लिया और शिराओं (वेन्स) से सम्बन्धित बीमारी है जिसमें पैर की ऊपरी सतह वाली नस में खराबी आ गयी है। पैर में हो चुके जख्म जिसे वेनस अल्सर कहते हैं, को ठीक करने के लिये रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन पद्धति के जरिये उपचार की योजना बनायी गयी। उपचार के बाद नासूर हो चुके जख्म में आश्चर्यजनक सुधार देखने को मिला।

रेडियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. एस. बी. एस. नेताम के नेतृत्व में डॉक्टरों ने बेहद ही संवेदनशील एवं सहयोगात्मक ढंग से इस बीमारी से शारीरिक तौर पर उबरने में मदद की। मेकाहारा पहुंचने में 10 साल का वक्त लगा दिया, यदि समय पर आता तो इतनी नहीं बढ़ती बीमारी। यह कहना है राजधानी रायपुर के बैजनाथ पारा में रहने वाले 55 वर्षीय पंकज दोशी का जिनकी वेरिकोज वेन बीमारी का उपचार मेकाहारा के रेडियोलॉजी विभाग में रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन पद्धति के जरिये हुआ।  कुछ इसी तरह से बलौदाबाजार जिले के अंतर्गत पलारी में रहने वाले 50 वर्षीय अशोक कुमार पटेल का अनुभव है। अशोक अब पहले की तरह ही अपनी खेती-किसानी से जुड़े काम आसानी से कर पा रहे हैं क्योंकि उनके पैरों की नसों में जो बीमारी थी उसका उपचार रेडियोलॉजी विभाग में होने के बाद पैर पहले की तरह ही ठीक हो गये हैं। दो महीने पहले अशोक कुमार पटेल को पैरों में कुछ ज्यादा ही तकलीफ होने लगी। पैरों की नसें फूल कर नीले रंग की होकर त्वचा में उभर गई थीं। बलौदाबाजार के एक अस्पताल में प्रारंभिक इलाज कराने के बाद अशोक ने अपनी बेटी के साथ मेकाहारा का रूख किया। यहां रेडियोलॉजी विभाग में जांच के बाद मरीज अशोक के पैर में वेरिकोज वेन बीमारी होना पाया गया। विभागाध्यक्ष डॉ. एस. बी. एस. नेताम ने कलर डॉप्लर जांच की जिसके बाद इंटरवेंषनल रेडियोलॉजिस्ट डॉ. विवेक पात्रे ने रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन के जरिये मरीज के वेरिकोज वेन का उपचार कर पैर को पहले की तरह ही ठीक कर दिया।

मरीज अब्दुल के पैर में भी वेरिकोज वेन के कारण समस्या उत्पन्न हो गयी थी। अब्दुल के दोनों पैर में भारीपन तथा खुजली की समस्या बनी रहती थ। रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन से उपचार के बाद इनके पैर की नसों की समस्या खत्म हो गई है और अब वे पहले की तरह ही ठीक हो गये हैं। मुझे वेरिकोज वेन नामक बीमारी है इस बात का पता मुझे मेकाहारा आने के बाद पता लगा। दोनों पैर के जांघ तक नसों का गुच्छा गुठली के समान दिखाई दे रहा था। डॉ. विवेक पात्रे ने दोनों पैरों का इलाज आर.एफ.ए. पद्धति से किया और मुझे दो दिन बाद ही अस्पताल से छुट्टी मिल गई। यह कहना है युवा मरीज कुलदीप का।

क्या है वेरिकोज वेन की बीमारी
मानव शरीर के परिसंचरण तन्त्र में धमनी और शिरा क्रमश: आॅक्सीजनयुक्त (आॅक्सीजेनेटेड) एवं आॅक्सीजनविहीन (डीआॅक्सीजेनेटेड) रक्त का परिवहन करती हैं। शिरायें या वेन्स ऊतकों से रक्त को वापस हृदय की ओर ले जाती हैं। गुरुत्वाकर्षण के विरूद्ध विपरीत दिशा में रक्त को पैरों के माध्यम से हृदय तक ले जाने के लिये शिराओं में वाल्व मौजूद रहते हैं। शिराओं के भीतर स्थित इन वॉल्व का कार्य रक्त को गुरुत्वाकर्षण के विपरीत केवल ऊपर की ओर ही जाने देना है लेकिन कई बार इन वाल्व के दुर्बल हो जाने से रक्त ऊपर की ओर नहीं चढ़ पाता या नहीं जा पाता। परिणामस्वरूप रक्त नीचे की ओर बहने लगता है जिससे शिरायें फूल जाती हैं और टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती हैं। ये फूली हुई शिरायें ही वेरिकोज वेन या अपस्फीति शिरायें कहलाती हैं।

वेरिकोज वेन के लक्षण
आमतौर पर वेरिकोज वेन के लक्षणों में नीली या गहरी बैंगनी उभरी हुई नसें, पैरों में भारीपन महसूस होना, मांसपेशियों में ऐंठन एवं दर्द, पैरों के निचले हिस्से में सूजन, रस्सियों की तरह दिखने वाली सूजी हुई या मुड़ी हुई नसें, लम्बे समय तक बैठने या खड़े होने के बाद दर्द होना, एक या एक से ज्यादा नसों के आस-पास खुजली होना, लम्बे समय तक पैर के घावों का न भरना एवं धीरे-धीरे त्वचा मोटी एवं काली पड?ा इत्यादि शामिल हैं।

रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन पद्धति से हुआ उपचार
इंटरवेंशनल रेडियोलॉजिस्ट डॉ. विवेक पात्रे उपचार के बारे में बताते हुए कहते हैं कि रेडियो फ्रीक्वेंसी एब्लेशन में सबसे पहले स्पाइनल एनेस्थेसिया से पीठ में सुई डालकर पैर को सुन्न कर देते हैं। घुटने के नीचे सुपरफिशियल वेन जो कि त्वचा के नीचे होती है, उसमें सुई डालते हैं और उस सुई की सहायता से ऊपरी जांघ तक आर. एफ. ए. एप्लीकेटर डाल देते हैं। उसके बाद आजू-बाजू में नार्मल सैलाइन डाल देते हैं जिससे आस-पास की त्वचा और ऊतकों को नुकसान ना पहुंचे। उसके बाद वेन को धीरे-धीरे अंदर ही अंदर जलाकर एप्लीकेटर को बाहर निकाल लेते हैं। जर्मनी से आयातित आर. एफ. ए. मषीन के जरिये उपचार में आधे घंटे से भी कम का समय लगता है। अगले दिन से ही मरीज अपने सामान्य दिनचर्या में वापस लौट सकता है।

टीम में ये रहे शामिल
रेडियोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. एस. बी. एस. नेताम के नेतृत्व में प्रो. डॉ. विवेक पात्रे के साथ डॉ. मनोज लहरे एवं डॉ. दिनेश साहू, डॉ. प्रभु दत्त एवं डॉ. निधि। एनेस्थेसिया विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. के. के. सहारे के साथ डॉ. अशोक सिंह सिदार, बतौर एनेस्थेटिस्ट शामिल रहे। इनके साथ ही नर्सिंग स्टाफ में प्रिया एवं दुर्गेश के साथ रेडियोग्राफर दीनबन्धु एवं नरेश उपचार के दौरान टीम का हिस्सा बने।

वर्तमान में मेकाहारा के रेडियोलॉजी विभाग में वेरिकोज वेन एवं नसों से सम्बन्धित अन्य विकारों का सम्पूर्ण इलाज डॉ. खूबचंद बघेल स्वास्थ्य सहायता योजना के अंतर्गत नि:शुल्क किया जा रहा है। धीरे-धीरे लोगों के बीच जागरूकता आ रही है और वे चिकित्सालय पहुंच कर उपचार का लाभ ले रहे हैं। रेडियोलॉजी विभाग की पूरी टीम तत्परता से मरीजों का इलाज कर रही है।