शिशु को मलेरिया होने पर दिखने लगते हैं ये लक्षण, जानिए इलाज का तरीका

शिशु की इम्‍युनिटी पॉवर बहुत कमजोर होती है इसलिए उन्‍हें बीमारियां आसानी से जकड़ लेती हैं। यहां हम आपको बच्चों में मलेरिया के लक्षण, कारण और मलेरिया के उपचार के बारे में बता रहे हैं। इस जानकारी की मदद से आप आसानी से अपने बच्‍चे में मलेरिया के लक्षणों की पहचान कर समय पर उसका इलाज करवा सकती हैं।

बच्‍चों और शिशु में मलेरिया कैसे फैलता है
प्‍लाज्‍मोडियम परजीवी से मलेरिया होता है। भारत में प्‍लाज्‍मोडियम विवैक्‍स और प्‍लाज्‍मोडियम फैल्‍किपरम नामक दो स्‍ट्रेन से मलेरिया होता है। संक्रमित एनोफेलस मच्‍छर के काटने पर मलेरिया फैलता है। यदि प्रेग्‍नेंसी में मलेरिया हो तो ये गर्भस्‍थ शिशु तक भी पहुंच सकता है। इसे जन्‍मजात मलेरिया कहते हैं। जन्‍म के पहले तीन महीनों में शिशु को मलेरिया होने का खतरा ज्‍यादा रहता है।
 
-आपको जानकर हैरानी होगी कि हमारे देश में हर 500 में से एक बच्चा ऑटिज़म से ग्रसित होता है। भारत में इस समय करीब सवा दो लाख बच्चे ऑटिज़म से पीड़ित हैं और हर साल करीब 12 हजार बच्चे इस बीमारी के रोगियों की लिस्ट में शामिल हो जाते हैं।अपनों का ही कत्ल करा देती है यह मानसिक बीमारी
ऑटिज़म की पहचान के तरीके
-छोटे बच्चों में अगर आप कुछ खास तरह के लक्षण देखते हैं तो पहचान सकते हैं कि उन्हें किसी तरह की व्यवहारिक समस्या का सामना करना पड़ रहा है। जैस, ऐसे बच्चे सामनेवाले की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं करते। यानी आई कॉन्टेक्ट से बचते हैं।-इस कारण ये बच्चे दूसरे लोगों को साथ कनेक्ट नहीं हो पाते हैं। ऐसे बच्चे अपने आपमें खोए रहते हैं और किसी भी दूसरे व्यक्ति के साथ अधिक समय रहना उन्हें पसंद नहीं होता है। इसमें इनके माता-पिता भी शामिल हैं।-अगर इन बच्चों के भाई-बहन भी हों तब भी ये बच्चे अकेले ही खेलते हैं। इन बच्चों के खेलने का ढंग नॉर्मल बच्चों की तुलना में कुछ अलग होता है। क्योंकि ये आतमतौर पर ठीक से गेम नहीं खेल पाते हैं। या खेल में भी एक ही क्रिया को बार-बार करते रहते हैं।दिमाग खराब करती हैं ये चीजें, इनसे दूरी भली
सोशल स्माइल
-जब भी हम स्माइल करते हैं तो सामने वाला भी स्माइल करता है। इसी को सोशल स्माइल कहते हैं। लेकिन ऑटिज़म से पीड़ित बच्चों में सोशल स्माइल की कमी होती है।-ऑटिज़म से पीड़ित बच्चों में भाव की कमी के साथ ही इमेजिनेशन की कमी होती है। जैसे सामान्य बच्चे अपनी कल्पनाओं की दुनिया में रहकर खेल में मस्त रहते हैं, ऑटिज़म से पीड़ित बच्चे इस तरह के खेल या कल्पना को इंजॉय नहीं कर पाते हैं।-आमतौर पर बच्चे माता-पिता के आवाज लगाने पर रिस्पॉन्स करते हैं। लेकिन ऑटिज़म से पीड़ित बच्चे ना तो बोलकर जल्दी से प्रतिक्रिया देते हैं और ना ही इनके चेहरे पर किसी तरह का भाव होता है। -जिन खेलों में बच्चे मिल-जुलकर खेलते हैं, उस तरह के खेलों में इन बच्चों की रुचि कम होती है। क्योंकि ये उस तरह के माहौल में और उस तरह की कनेक्टिविटी में खुद को फिट नहीं कर पाते हैं।बाथ और पॉटी से फ्री ही नहीं होने देता OCD
इन बच्चों की लैंग्वेज भी डिवेलप नहीं हो पाती है
-ऑटिज़म से पीड़ित बच्चे अपनी जरूरतों को भी बोलकर बताने में असमर्थ होते हैं। आमतौर पर इन्हें जो भी चाहिए होता है, उस चीज को ये इशारा करके मांगते हैं। जैस अगर बच्चे को पानी चाहिए तो वह अपनी मदर को हाथ पकड़कर रसोई में ले जाएगा और पानी की तरफ इशारा करके कहना चाहेगा कि ये चाहिए। मुंह से बोलकर नहीं कहता कि पानी चाहिए।-इसका कारण इन बच्चों में भाषा का विकास ना होना होता है। ये बच्चे आमतौर पर शब्द तो बोल पाते हैं लेकिन वाक्य नहीं बोल पाते हैं। कभी कुछ बोलने का प्रयास करते हैं तो इनकी बात को समझना मुश्किल होता है क्योंकि इनके शब्दों में कनेक्शन नहीं होता है।प्यार के भूखे होते हैं ये लोग, इन्हें है अपनेपन की जरूरत
हवा से करते हैं बातें
-ऑटिज़म से पीड़ित बच्चे सामान्य बच्चों की तरह लोगों से कॉन्टेक्ट नहीं कर पाते हैं। लेकिन हवा के साथ इनकी बातें अक्सर होती हैं। ये बच्चे आसमान की तरफ देखते हुए हवा में किसी भी तरह की शेप बनाते रहते हैं या कोई ड्रॉइंग करते रहते हैं। जिसे सिर्फ यही समझ पाते हैं। आप इसने इनकी बात पूछने या समझने का प्रयास करेंगे तो ये अपनी बात समझा नहीं पाते हैं। 
बहुत सेंसेटिव होते हैं
-ऑटिज़म से पीड़ित बच्चे कुछ चीजों को लेकर ओवर सेंसेटिव होते हैं। जैसे, आवाज, स्वाद, रौशनी आदि। इन बच्चों को अधिकांश वे साउंड पसंद होते हैं, जिन्हें एक नॉर्मल इंसान सुनना पसंद नहीं करता है। जैसे बॉक्स खिसकाने के आवाज, प्लास्टिक पीटने की आवाज आदि।-किसी चीज का स्वाद पसंद आने पर उसे जब-तब मुंह में डाल लेते हैं। ऐसा सामान्य बच्चे भी करते हैं। लेकिन इनके करने का तरीका और ऐसा करते समय इनका व्यवहार देखकर आप समझ सकते हैं कि बच्चे के साथ कुछ दिक्कत है। ऐसे पहचानें किसी के मन में आत्महत्या का विचार
ये लोग कर सकते हैं मदद
-प्ले स्कूल के टीचर्स या प्राइमरी स्कूल के टीचर्स बच्चों में इस तरह की समस्या का जल्दी पता लगा लेते हैं। क्योंकि ये लोग एक वक्त में एक से अधिक बच्चों के साथ रहते हैं तो ये बच्चों के व्यवहारिक अंतर को जल्दी पहचान पाते हैं।-जबकि पैरंट्स के पास एक या दो बच्चे होते हैं, इसलिए उनके लिए बच्चे के व्यवहार में इसतरह की